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Friday, December 30, 2011

अमरबेल



मै लिपटी रही तुममें,
तुम ठूठ से खडे रहे,
मैनें आत्मसात किया
रोम-रोम तुम्हारा,
तुम्हारे रक्त में
घोल दी अपनी
भावनायें,
समर्पित किये
छुये अनछुये पल,
जड से शीर्ष तक
लिपटकर
खो दिया अपना वज़ूद,
तुम छुडाने का उप्क्रम करते रहे
और भागते रहे
परछायियों की तरफ,
लौटे तो दे दिया मुझे नाम
अमरबेल,
और घोसित कर दिया
अपने ठूठ हो जाने का कारण मुझे,
मैं फ़िर भी लिपटी रही
इसी प्रतीछा में कि
न जाने तुम कब
हरे हो जाओ और
आने वाली पीढियां
समझ जायें
तुम्हारे अस्तित्वहीन कुतर्क.


- कुश्वंश

(चित्र गूगल से साभार )

3 comments:

Dr.J.P.Tiwari said...

बहुत खूब! अमरबेल को बिम्ब बनाकर कही गई एक अनोखी कहानी. आखिर इस अमरबेल की वास्तविकता को, इसके दर्द और संवेदना को अबतक शायद इस रूप में किसी ने अभिव्यक्त नहीं किया था. एक सर्वथा अनूठा प्रयोग और साहित्य को समृद्ध करता एक विचारणीय और सारगर्भित पोस्ट.बहुत अन्दर तक कुरेद गयी, अमरबेल की तार्किक और प्रखर वाणी. आभार इस उच्छ्कोती की रचना के लिए. नवर्ष की शुभ काम

sushma 'आहुति' said...

सुन्दर अभिव्यक्ति.........नववर्ष की शुभकामनायें.....

pradeep tiwari said...

bahut sundar wahh