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Monday, December 12, 2011

दहशत की ज़द में अब मीडिया भी....



तारीख़ गवाह है कि भले ही मीडियाकर्मियों पर सैटिंग अथवा वसूली के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं लेकिन समाज के इस कथित चौथे स्तंभ की सक्रियता से इस देश में हो रहा अरबों का भ्रष्ट्राचार थोड़ा ही सही पर कंट्रोल में है । यक़ीनन ये मीडिया ही है जिसकी वजह से राष्ट्र्मंडल खेलों में हुआ व्यापक भ्रष्ट्राचार उजागर हो सका । ये मीडिया की ताक़त ही है की संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने वाले दुर्योधनों को राजनीत की महाभारत में शिकस्त झेलनी पड़ी । ये मिडिया ही है जिसमें भारत की सरकारों पर सर्वोच्य पदों पर आसीन व्यक्तियों का घिनौना चेहरा जनता को दिखलाने का भरपूर माद्दा है । मीडिया ने ही इस देश में अनाचारी आई.पी.एस. और भ्रष्ट्राचारी आई.ए.एस. अधिकारियों को बेनक़ाब करनें में अहम भूमिका निभाई है लेकिन यही मीडिया अपनी इसी बेबाकी की वजह से हमेशा ही राज्य तथा केन्द्रीय सरकार की आँख में कांटे की तरह चुभता रहता है ।
पिछले हफ्ते ही एक नये तथा तेज़ी से प्रसिद्ध हो रहे एक दैनिक अख़बार ने छत्तीसगढ़ में सरकार के काम-काज पर तल्ख़ क़लम चला कर सनसनी फैला दी  थी । इसी अख़बार ने हाल में ही मध्यप्रदेश में लीज़ पर गयी बेशकीमती खदानों के बारे में छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखिया के उपर आरोपों की चंद बून्दे टपकाने का अदम्य साहस भी दिखाया और इस मामले में उसका साथ दिया मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के एक लोकप्रिय समाचार चैनल ने । निश्चित तौर पर यह बात प्रदेश की राजनीति की बागडोर संभाल रहे आकाओं को नाग़वार गुज़री और उन्होनें एक फरमान जारी कर उक्त समाचार चैनल का मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में जारी प्रसारण केबल ऑपरेटरों को निर्देशित कर बंद करा दिया । सरकार के प्रति कृतज्ञ कुछ युवा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगाँव में बाकायदा उक्त न्यूज़ चैनल का पूतला दहन भी कर  दिया । अब संभवतः अगली बारी उस समाचार पत्र की भी हो सकती है जिसे उक्त समाचार चैनल के प्रसारण पर रोक लगाकर एक तरह से सीधी चेतावनी दे दी गयी है । अब मीडियाकर्मियों को भी ज़िंदगी गुज़ारने के लिये ज़ाहिर तौर पर रोज़ी-रोटी की ज़रूरत पड़ती है लिहाज़ा बाक़ी सबने समझौते के अघोषित कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिये और सरकारी भौंपू की आवाज़ हमेशा की तरह बुलंदगी के मक़ाम तक पहुंचाने की क़वायद में भिड़ गये । रह गया तो उस समाचार चैनल का वह साहसी स्टाफ जिसने वो कहने और करने का साहस किया जो सरकारी दहशत की ज़द में आये लोगों के पास नहीं था । इस मामले में अब तक कोई कुछ भी साफगोयी से खुलकर कहने को राजी नहीं है । हर तरफ एक अजीब सी ख़ामोशी छायी हुई है । प्रदेश के समस्त पत्रकार संगठनों ने मौन धारण किया हुआ है । मैनें भी दबी ज़बान से उसी चैनल में काम करने वाले मेरे एक मित्र से पूछा कि भाई...आख़िर माजरा क्या है??उसने भी बेबाकी से कहा की कोई भी समाचार बुनियाद के पत्थरों पर ही खड़ा होकर सामने आता है और यही हुआ भी है । दहशतगर्दी की ज़द में आये मीडिया को उसने सरफरोश बिस्मिल के शेर से हौसला दे दिया उसने बातों ही बातों में कहा कि वक़्त आने दे बता देंगे तूझे ए आसमाँ...हम अभी से क्या बतायें...क्या हमारे दिल में   है ‘ ....

2 comments:

Swati Vallabha Raj said...

ye to aagaaz hai...anzaam abhi baaki hai....bahut sundar....

अली शोएब सैय्यद said...

शुक्रिया स्वाति जी
अंजाम की भयावहता क्या होगी...सोच कर भी कपकपीं सी आ जाती