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Thursday, December 29, 2011

मेरा तम



अधियारे की रोशनी  ने 
                    सूरज को छुपा दिया|
ऐसा लगा अबकी ग्रहण की
                       तम ने अपना घर बना लिया|
एक जुगनू  चमकी थी
                         पर अधियारा छटा नहीं|
पर कोशिश ऐशी  थी उसकी 
                           की दिल से कभी बुझा नहीं|
जीवन पथ था ऐसा उसका
                            अंधियारे मे भी छुपा नहीं|
चल अब हम मिल दिल जुगुनू जलाये
                             इस तम को को मार भगाए|
जुगुनू जल दीपक होंगे
                             दीपक जल होंगे सूरज|  
सूरज होगा ऐसा  की
                            होगी पूरी रोशनी की जरुरत|




                 रचनाकार --pradeep तिवारी
www.pradeeptiwari.mca@gmail.com
kavipradeeptiwari.blogspot.com



2 comments:

Swati Vallabha Raj said...

जलाते चलो ये दीयें स्नेह भर-भर,कभी तो धरा का अन्धेरा मिटेगा...सुन्दर प्रस्तुति....

***Punam*** said...

चल अब हम मिल दिल जुगुनू जलाये
इस तम को को मार भगाए|

khoobsoorat...