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Tuesday, December 13, 2011

याद आती है हमें वो सर्दियाँ....

याद आती है हमें वो सर्दियाँ....
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गर्म गुड के गुलगुलों के दिन गये
बाजरे के  खीचडों  के  दिन गये
अब तो पिज़ा और नूडल चाहिये,
हाथ वाले  सिवैयों के   दिन गये
सर्दियों में आजकल हीटर जलें,
संग तपते अलावों के दिन गये
तीज और त्योंहार पर होटल चले,
पूरी  ,पुआ ,पुलाओं के  दिन गये
बिना चुपड़ी तवे की दो चपाती,
आलुओं के परांठों के दिन गये
गरम रस की खीर या फिर लापसी,
उँगलियों से चाटने के दिन गये
बैठ छत पर तेल की मालिश करे,
धूप में तन तापने के दिन गये
बढ न क्लोरोस्टाल जाये,डर कर इसलिए,
जलेबियाँ उड़ाने के दिन गये
गरम हलवा गाजरों का याद है,
रेवड़ियाँ चबाने के दिन गये
धूप  खाती थी पड़ोसन छतों पर,
उनसे नज़रें मिलाने के दिन गये
याद आती है हमें वो सर्दियाँ,
वो मज़ा अब उड़ाने के दिन गये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

2 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति| धन्यवाद|

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!
शुभकामनाओं सहित!