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Sunday, December 11, 2011

हाँ मैं जीवन देख रही थी....

खिड़की पर खड़ी मैं नीचे जीवन देख रही थी|
भारी बस्तों के बोझ तले कुचले बचपन देख रही थी|
सूनी आँखों में मरे हुए मैं स्वप्न देख रही थी|
माँ-बाप के ख्वाहिशों धोते मैं रुदन देख रही थी|
रक्त-रंजीत कदम की राह में पड़े नुकीले कुरून देख रही थी|
हाँ मैं जीवन देख रही थी,मैं बचपन देख रही थी|
कल मैं छुटपन पे पड़े कफ़न देख रही थी|
आज मैं जीवन और कल मैं मरण देख रही थी|

कवयित्री परिचयः-
स्वाति वल्लभा राज 
नोयडा/बिहार

2 comments:

मेरा अव्यक्त said...

बहुत अच्हा लिखा है. रामकिशोर उपाध्याय

मेरा अव्यक्त said...

बहुत अच्छा लिखा है. रामकिशोर उपाध्याय