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Thursday, December 8, 2011

वक़्त की रफ़्तार

बेगुनाह भी मैं,गुनाहगार भी मैं|
विध्वंसकारी,रचनाकार भी मैं|
सारी सृष्टि तन्मय मुझमे,
इस सृष्टि से बेज़ार भी मैं|
हर रूप में मैं,सब रूप मेरा|
साकार हूँ तो निराकार भी मैं|
ब्रह्मनाद ओमकार भी मैं,
नास्तिकों का तिरस्कार भी मैं|

रक्त-पिपासु तलवार भी मैं,
प्यास बुझती धार भी मैं|
आती मृत्यु का सत्कार भी मैं,
वैतरणी की पतवार भी मैं|

जान सको तो जान लो,
मान सको तो मान लो|
कुछ और नहीं कुछ और नहीं,
वक़्त की रफ़्तार हूँ मैं|

कवयित्री परिचयः-
स्वाति वल्लभा राज 
नोयडा/बिहार

4 comments:

मनीष सिंह निराला said...

बहुत बेहतरीन ...हर पंक्तियाँ रोमांचित कर गया !

वन्दना said...

वाह वाह बहुत ही सुन्दर भावाव्यक्ति।

Rajput said...

रक्त-पिपासु तलवार भी मैं,
प्यास बुझती धार भी मैं|
आती मृत्यु का सत्कार भी मैं,
वैतरणी की पतवार भी मैं|
बेहतरीन पंक्तियाँ.

Dr.Bhawna said...

जान सको तो जान लो,
मान सको तो मान लो|
कुछ और नहीं कुछ और नहीं,
वक़्त की रफ़्तार हूँ मैं...

Bahut khub!