*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Sunday, November 13, 2011

है जन्म दिन छोटे का



कल है जन्म दिन छोटे का
बार बार प्रश्न करता है
मां तुम केक कब लाओगी
मेरे लिए क्या बनाओगी |
इस बार जींस लाना
नया शर्ट भी दिलवाना
अभी वह नहीं जानता
महंगाई क्या होती है
गरीबी किसे कहते हैं
घर की हालत ऐसी क्यूँ है?
उसके प्रश्न सुन कर
दिल छलनी होने लगता है
रोने को मन करता है
वह सोचने लगती है
कैसे उसे संतुष्ट करे
उसकी सालगिरह कैसे मनाए |
सड़क पूरी सूनी है
काफी रात बाकी है
भारी कदम लिए खड़ी
सोच रही कल क्या होगा |
एक कार पीछे से आई
ड्राइवर ने होर्न बजाया
बेध्यानी में सुन ना पाई
थी गति गाड़ी की धीमी
चोट लगी पर मृत्यु ना आई |
कार वाला डर गया था
पांचसौ का नोट निकाला
उस पर फेंका और चल दिया
जैसे तैसे घर को आई
अपनी चोटों को सहलाया |
पर वह यह सोच खुश थी
कल सालगिरह तो मन पाएगी
प्रश्नों की झड़ी से तो बच पाएगी
चोटों का क्या वे तो
ठीक हो ही जाएंगी|
आशा

1 comment:

वन्दना said...

यथार्थ को उजागर करती संवेदनशील रचना।