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Tuesday, November 22, 2011

सामाजिक प्राणी

अजीब दुनिया है...
आप सब लोग समझते होगे कि इतने लेख लिखती हूँ, तो मुझे सब दुनियादारी समझ ही आती होगी!
पर इस दुनिया को और यह के लोगो को समझना इतना आसान कहा है?
छोटी सोच और तुच्छ विचारो को हमारे समाज से ये शिक्षा भी दूर नहीं कर पायी है!
अगर इन सब संकरे विचारो के दायरे से बहार निकल जाते तो आज ये हालत न होती हमारे समाज की.
और जो कोई इन सब से ऊपर उठाना चाहता है, उसे न ही बल्कि रोका जाता है, खीच कर अपने स्तर तक लाने में 

कोई कसार नहीं छोड़ी जाती!


अगर गलत को गलत नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए?
मुझे तो ये समझ नहीं आता कि लोग लड़ाई को बढाकर उसे राइ का पहाड़ क्यों बनाते हैं?
क्यों उसे बैठकर, समझ कर सुलझा नहीं सकते?
किसी महापुरुष ने ठीक ही कहा है कि क्रोध बूढी को भ्रष्ट कर देता है!

चिलाना, चीखना या फिर जब मन आये कुछ भी कह जाना, सामने वाले के सम्मान और प्रतिष्ठा की बिना कुछ चिंता किये! और फिर अगली बार उसी इंसान से आचे व्यवहार की उम्मीद करना! क्या यह सही है?
क्या किसी की गलती का यही हल है?
क्या हम उसे आसान, सीधे शब्दों में उसकी गलती बता कर उसे अत्म्गलानी के लिए नहीं छोड़ सकते?
कि उससे वह भूल फिर से न हो!
क्या वास्तव में गुस्सा होने से हमारी समस्या का हल निकल जाएगा ?

हाँ, ये भी बात है कि कुछ लोग होते हैं, जिन्हें शांत करने के लिए आपको कड़ी भाषा अपनानी पड़ती है, किन्तु वह बचाव होता है! अगर वह लोग पहले ही समझ जाए कि बस अब मैं अपनी बात कह चूका, हावी होने से कोई हल नहीं निकलेगा, तो फिर हमें वह कड़े शब्द बोलने ही न पड़ेंगे!


आप सब सोच रहे होंगे कि आज अचनक मैं  यह समाज की छोटी सोच और क्रोध की बात क्यों कर कर रही हु?
तो इसका जवाब ये है कि, कल ही मैं अपने पैत्रक शहर आई हूँ, अपने परिवार के सदस्यों से मिलने!
यहाँ आकार हेमशा अहसास होता है कि चाहे कितनी भी विद्या हमारे गावो में पहुच गई हो, कित्नु वो सिर्फ रतन विद्या ही है, जिसका वास्तव में कोई अर्थ नहीं निकलाकर आता!
अभी भी लोग उठाना, बैठना, और किसी से कैसे व्यवहार करना है? नहीं सीखे हैं!
अभी भी किसी की कही एक बात को पकड़ कर सर फोड़ने की नौबत आ जाती है, ये जाने बिना कि क्या वास्तव में सामने वाला यही कहना चाहता था?
आज भी जब कोई अच्छी बात बताई जाए, इसे लोग "शहरी  चोचले" कहते हैं!

यहाँ आई तो ऐसे ही कुछ समझाए बिना रहा न गया!
भाई को कुछ बोला तो बिना मतलब जाने चिल्लाना शुरू हो गया कि " तुझसे बड़ा हूँ, ज्ञान न दे!" ज्यादा जानता हूँ! और फिर उस बात को इतना बढ़ा दिया कि मेरे पास समझाने और बोलने को कुछ न रहा!
और जब मैं चुप रही तो बाकी सब को लगा कि मेरी ही गलती है !
और सब मुझ पर बरस पड़े कि बड़ो से बात करने कि तमीज नहीं है!

तो ये था हादसा !
छोटी सोच और सकरे विचार इसलिए कहा
क्युकी , आज भी उन्हें लगता है कि अगर मैं बड़ा हूँ, तो मुझे सब आता है, मैं परम ज्ञानी हूँ!
अरे ! ये भी भला कोई जवाब हुआ?
क्या अपने से छोटी उम्र के लोगो से नहीं सिखा जा सकता? इससे बद्दापन कम नहीं होता!
क्या अगर आपकी कंपनी का C.E.O. आपसे छोटा है तो आप उसे ये कहोगे कि इसे क्या पता ? मैं इससे बड़ा हूँ, ज्यादा दुनिया देखी है!
आज भी वो लोग समाज के कहे चलते हैं!
यहाँ मैं ये नहीं कहती कि समाज के हिसाब से चलना गलत है!
मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज में रहना और उनके हिसाब से चलना ही चाहिए!


किन्तु अगर कुछ गलत है तो उसे सही कहने कि हिम्मत भी होनी चाइये!
ये कौनसी बात हुए कि समाज के खातिर अपनी यह अपने परिवार के लोगो की ख़ुशी भूल जाए और घुट-२ कर जिए?
अरे यह समाज हमारा है और हमसे बना है! कोई पत्थर की लकीर नहीं जो मिट नहीं सकती !

मेरी यह कोशिश तो उन्हें समझाने की नाकामयाब रही और उल्टा मुझ पर ही आरोप आये कि,
मुझे बड़ो का आदर करना नहीं आता और शहर के लोगो जैसे गुण आ गए हैं, जिन्हें समाज और अपनों से कोई लेना-देना नहीं होता!

लेकिन फिर भी हमेशा कोशिश करती रहूगी, कि अपनी बात उनके सामने रख कर समझा सकू!

आप सब के विचार आमंत्रित हैं!

धन्यवाद आपके बहुमूल्य समय के लिए!

गुंजन झाझारिया
http://lekhikagunjan.blogspot.com/

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