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Thursday, November 17, 2011

तलाश है....

वैसे तो अब सब कुछ खलास है,
                        फिर भी मुझे एक जिंदगी की तलाश है ।                                          

बोल रहा है इंसा तो इससे क्या हुआ,
प्रेम रहित जीवन तो जिंदा लाश है ।
मर्यादा रहित चहकने से क्या होता है बंधुओं,
पर पीड़ा बिन हर आवाज वे साज है ।

पड़े लिखे इंसा को नौकरी की तलाश है,
साहित्यकार को एक मंच की तलाश है ।

इस विशाल राष्ट्र को बापू की तलाश है,
गरीब इंसा को रोटी की तलाश है ।

जो रख सके गुलिस्ता को सुरक्षित,
अब एक ऐसे वफादार माली की तलाश हैं ।

मै ढ़ूढ़ता रहता हूँ यहाँ वहाँ इंसानो को लोगो,
सच कहता हूँ ‘प्रदीप’ मुझे एक मानव की तलाश है । 
   
कवि परिचयः-  
प्रदीप मेहरा
शिक्षा:-MA Economics B.Ed.
नरसिंघपुर (म.प्र.)
मो:-9407050080



2 comments:

मनीष सिंह निराला said...

बहुत खूब हर शेर उम्दा ..
बधाई हो ..
मेरे ब्लॉग "जीवन पुष्प" पे आपका हार्दिक स्वागत है ..
http//:mknilu.blogspot.com

***Punam*** said...

उम्दा शेर ..