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Saturday, November 5, 2011

चाहत....

 
चाहत....
 
ढाये चाहत ने सितम हम पे हैं  कुछ इस तरह,
रोते-रोते भी हंस दिए हैं हम  कुछ इस तरह !
चाहा  के  तुझको  छुपा  लूं   मैं  कहीं  इस तरह,
मैं ही मैं देखूं जमाने से छुपा कर  इस तरह !! 

तू था खुशबू की तरह,बिखरा जो फिर,छुप न सका,
बस मेरे दिल में रहे,ये भी तो तुझसे हो न सका !
रूह से अपनी जुदा   सोचा  कभी  कर दूं    तुझे ,
बन हया चमका जो नजरों में मेरी,छुप न सका !! 

चाह बन कर के मेरी ये चाह कभी रह न सकी,
गुफ्तगू तुझसे की जो चाहा छुपे, छुप न सकी !
तेरे सीने पे  सिर रख कर कभी मैं रो न सकी,
तेरे  आगोश में  आकर  कभी मैं  सो न सकी !!

आज है वो रात ,मैं  हूँ कहाँ और तू है कहाँ, 
बदले  हालात हैं और  बदल गए  दोनों  जहाँ !
साथ न रह के भी तू साथ मेरे, मेरे सनम!
दो बदन हम नहीं,एक रूह हैं,एक जान हैं हम !!  

2 comments:

sushma 'आहुति' said...

very nice...

meenakshi said...

" chahat" bahut bhav-poorn rachna.. lagi..parantu "chitr " Chahat ke anuroop nahin laga...yani chitra sheeshrshak aur kavya ka prateekatmak nahin lagata hai..nextime isko bhi dhyan men rakhen...dhanyawad...
Meenakshi Srivastava