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Tuesday, November 15, 2011

मेरी तन्हाई


ज़माने भर की महफ़िल वीरान लगी, 
बस तू ही मुझे सबसे खास लगी|
 हर अपना बेगाना होने लगा ,
 बस तू ही मेरे सबसे पास लगी|
 हर जख्म हरा करने को दिल चाहा,
 इन जख्मो मे तेरी याद  बसी|
 हम जानते थे अंजामे मोहब्बत का,
 फिर भी क्यों मुझे  तू मेरी जान लगी|
  जानता था तेरी बेवफाई न जाने कब से,
पर जानते हुए भी क्यों तुझसे ही  वफ़ा की आस  लगी|


रचनाकार --प्रदीप तिवारी
www.kavipradeeptiwari.blogspot.com

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