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Tuesday, November 15, 2011

माँ की अनंत विरासत !!

कुछ सोचकर ईश्वर ने 
बनाई एक अप्रतिम प्रतिमा
सदगुण कि सोंधी मिट्टी,
प्रेम दया औऱ क्षमा,
जब भी मन होता है अकेला,
खोजता है वही आँचल का कोना
वो माटी का घरौंदा और वो गीला बिछौना।
छलक उठा आँखों का सागर, लहरों के सैलाब से,
भीग गया माँ का आँचल ममता की आंच से.
सांझ हो चली एक उजियारा भोर की
पके चेहरे पर अनुभवों के लकीर की.
श्वेत श्याम केशों की लकीरें गहरे हो चली 
माँ की गौरव गाथा संजीव बन सुनहरी हो चली। 

होम करते रहे दोनो हाथ,कर्तव्यों की वेदि पर 
आँच न आने दी कभी अधिकारों की आहुति पर 
आँचल तले देती रही,सुकून भरी छाव
छुकर माथा मिटा देती,तन मन के सब घाव.
बांधा उसने सबको एक अटूट स्नेही डोर,
इन धागों के नहीं थे कभी अलग अलग दो छोर।

छलकाती रही अमृतकोश सदैव,निरन्तर गतिमान,
बहती रही प्रेम पयोधि सबके लिये एक सामान
आत्मसम्मान था उसका गहना,दया,क्षमा थी उसकी दौलत.
सत्य धर्म, धीरज बने, उसके यश और शोहरत।
माँ थी वो जीवन पथ की उज्जवल ज्वाला 
लौ बनकर जिसने फैलाया उजाला
अब आंखे हो रही है बंद, यात्रा का असमाप्त अंत,
दिव्यआत्मा बन गई वो जैसे समाधिअस्थ है कोई संत।

अनंत है माँ के विरासत,अक्षुण्ण है माँ की स्मृति शेष
मै भी बन प्रतिनिधि माँ की बिखेर रही हूँ विरासत अशेष 
सहेज कर इस दौलत को दे रही हूँ यही संदेश
हर माँ होती है अनोखी पर मेरी माँ है सबसे विशेष।


कवियित्रि परिचयः-
अर्चना नायडू
कवियित्री,लेखिका
M.Sc. , B.Libs.
जबलपूर,(म.प्र.)
nayudu.archana@gmail.com

3 comments:

सदा said...

बिल्‍कुल सच कहा मां पर जब भी जितना कहा जाए वह कम होता है ... भावमय करती प्रस्‍तुति के लिए बधाई ।

***Punam*** said...

भावमय प्रस्‍तुति....!!

SHOONYA AKANKSHI said...

माँ पर लिखी आपकी कविता भावनाओं की गहनतम अनुभूति से उपजी कविता है. माँ के प्रति आपका समर्पण भाव स्तुत्य है.
- शून्य आकांक्षी