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Wednesday, October 12, 2011

परिवर्तन

जमाने को अपने हालात क्या बतलाते,
हम अपनों को दिए जख्म सिल रहे है|
         जज्बातों की आँधी कब की सांत हो चुकी '
        अब तो  हम  बस अपनों से लड़ रहे है|
जिन्दगी दी थी अपनों को कभी'
वही मेरे  मौत पर हस रहे है|
       अपनों को रखा था हमेसा  करीब
       क्यों वो  अब पराये से  लग रहे है|
मौत तो कब की हो चुकी है मेरी,
फिर क्यों  मरे प्राण अटके पड़े है|
         कब्र खोदी थी  खुद ही मैंने अपनी,
        फिर क्यों दफ़न होने से डर रहे है|

रचनाकार--प्रदीप तिवारी 
www.pradeeptiwari.blogspot.com
pradeeptiwari.mca@gmail.com

3 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

prerna argal said...

अपने दिल के दर्द को .अपनों द्वारा दिए गम को कीतनी अच्छी तरह अपनी रचना के माध्यम से शब्दों में पिरोया है /लाजबाब रचना /बधाई आपको /

मनीष कुमार ‘नीलू’ said...

बहुत सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति...|
कभी मौका मिले तो मेरे ब्लाग पर भी आयें।
http://www.mknilu.blogspot.com/