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Saturday, October 1, 2011

बढती उमर की ग़ज़ल

मेरा प्यार लगता तुझे चोंचला है
मेरी जान तुझको ये क्या हो चला है
किये होंसले पस्त तुने अभी से
बुलंदी पे अब भी मेरा होंसला है
 
बढा प्यार मेरा है संग संग उमर के
उमर ही ढली है न यौवन ढला है
मचलते हैं जोशे जवानी में सब ही
मोहब्बत का असली पता अब चला है
उड़े सब परिंदे बसा अपनी दुनिया
अब हम दो बचे हैं और ये घोंसला है
मोहब्बत भरी ये मेरी धुंधली आँखें
तेरी झुर्रियों का पता कब चला है
चलो फिर से जी ले जवानी के वो दिन
यही सोच कर के नया सिलसिला है

2 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद्|

डॉ. जेन्नी शबनम said...

achchhi rachna, shubhkaamnaayen.