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Sunday, October 2, 2011

खोटे सिक्के


बापू तुमने तब जिन पर था विश्वास किया

वे तो सब के सब कागज़ के पुरजे निकले ,

था जिनकी बातों पर तुमको अभिमान बड़ा ,

वे तो सब के सब लालच के पुतले निकले !


क्यों आज लुटेरों का भारत में डेरा है ,

क्यों लोगों के मन को शंका ने घेरा है ,

क्यों नहीं किसीको चिंता रूठी जनता की ,

क्यों नहीं किसीको परवा आहत ममता की ,

बापू तुमने था जिनको यह भारत सौंपा ,

वे तो सब के सब बस खोटे सिक्के निकले !


क्यों आतंकी दहशत में जनता सोती है ,

क्यों हर पल मर मर कर यह जनता रोती है ,

क्यों आये दिन वहशत का साया रहता है ,

क्यों आये दिन मातम सा छाया रहता है ,

बापू तुम केवल लाठी लेकर चलते थे ,

लेकिन ये तो संगीनों के आदी निकले !


बापू हम संसद की गरिमा खो बैठे हैं ,

जाने कितने मंत्री जेलों में बैठे हैं ,

जाने कितनों के धन का काला रंग हुआ ,

जाने कितनों का खून पसीना एक हुआ ,

बापू जनता पर तुमने सब कुछ वारा था ,

पर ये सब जनता को दोहने वाले निकले !


बापू क्यों अब तक हमने तुमको बिसराया ,

क्यों नहीं तुम्हारी शिक्षाओं को दोहराया ,

अब जब भारत पर खुदगर्जों का साया है ,

इनको सीधा करने का अवसर आया है ,

बापू तुमने हमको जो राह दिखाई थी ,

उस पर चलने को कोटी-कोटि कदम निकले !


साधना वैद


चित्र गूगलसे साभार

2 comments:

Neeraj Dwivedi said...

Bahut hi pyari kavita, saty dikhati kavita.
Sundarta ke sath hi, jeevan ki raah dikhati kavita.

कोई चाहने वाला होता
टूट गया सूरज दीपों में
.

Ghotoo said...

sunder aur yatharth ko darshati hui sateek rachna

ghotoo