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Tuesday, October 11, 2011

अपना गॉंव


जन्मभूमि की सौंधी मिट्टी मे
हम प्रेमजल बरसायेंगे,
पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।

अकेले खेतों के पगडंडी से
हम लकड़ी नही लायेंगे,
गॉंव के लोग घूरते हैं मुझको
हम पनघट पे कैसे जायेंगे।

पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।

मर गई बकरी, दुबली है गैया
चारा क्या इसे खिलायेंगे?
बीमार पड़ी है खाट पे मैया,
दवा क्या इन्हें पिलायेंगे।

पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।

हमें नही महलों का सपना
टूटी मड़ैया सा घर अपना,
इसी में खूशी के दो पल
हम सब साथ बितायेंगे

पिया लौट के आजा अपना गॉंव
हम सूखी रोटी ही खायेंगे।





मनीष कुमार ‘नीलू’
समस्तीपुर बिहार
E-mail: jiya_jist@yahoo.com 

4 comments:

pradeep tiwari said...

gao aor garibi bhaut khub chitran kiya hai badhai ho

मनीष कुमार ‘नीलू’ said...
This comment has been removed by the author.
Pallavi said...

सच्चे भाव लिए सुंदर एवं सार्थक प्रस्तुति
समय मिले तो कभी आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com

गुड्डोदादी said...

बहुत सुदर भावपूर्ण
मेरा गावँ
तलत महमूद जी की गजल के पंक्ति

मेरा प्यार मुझे लौटा दो
मै जीवन उलझ गया हूँ
तुम जीना सिखला दो