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Thursday, October 6, 2011

मेरा अस्तित्व

मेरा अस्तित्व

तू बरगद का पेड़
और मैं छाँव तेरी
है यदि तू जलस्त्रोत
मैं हूँ जलधार तेरी |
तू मंदिर का दिया
और मैं बाती उसकी
अगाध स्नेह से पूर्ण
मैं तैरती उसमे |
तूने जो चाहा वही किया
उसे ही नियति माना
ना ही कोइ बगावत
ना ही विरोध दर्ज किया |
पर ना जाने कब
पञ्च तत्व से बना खिलौना
अनजाने में दरक गया
सुकून मन का हर ले गया |
कई सवाल मन में आए
वे अनुत्तरित भी न रहे
पर एक सवाल हर बार
आ सामने खडा हुआ |
है क्यूँ नहीं अस्तित्व मेरा
वह कहाँ गुम हो गया
मेरा वजूद है बस इतना
वह तुझ में विलीन हो गया |
आशा




5 comments:

Dr Varsha Singh said...

है क्यूँ नहीं अस्तित्व मेरा
वह कहाँ गुम हो गया
मेरा वजूद है बस इतना
वह तुझ में विलीन हो गया |

भावपूर्ण रचना....

विजयादशमी पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं।

Neeraj Dwivedi said...

Waah Asha jI bahut sundar

आशा said...

वर्षा जी और नीरज जी आपका धन्यवाद टिप्पणी करने के लिए |
आशा

***Punam*** said...

bahut sundar kavita.....!
badhaayi.....!!

आशा said...

पूनम जी टिप्पणी के लिए आभार |
आशा