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Monday, October 31, 2011

मै और मेरी वफ़ा

तुने मुझे बेवफा कहा,ये भी मुझे मंजूर है,
तेरी जिन्दगी मुझसे नहीं कही तो जरुर है|
हमने अपनी वफ़ा को बेवफा नाम दे दिया,
क्यू की तेरी किस्मत का सितारा कोई और है|
तेरी राहों  में  फूल  बिछाते  रहे हम,                 
गमो को छुपाकर हसते रहे हम|
मेरे अंधेरो का साया न मिले तुझे ,
तेरी रोशनी के लिए जलते रहे हम|
वफादारी वो भी न करता तेरे लिए ,
जो बेवफा बनकर करते रहे हम|
जिस मंजिल मे बैठकर तुम इतरा रहे हो आज ,
उस मंजिल की सीढी बनाते रहे हम|
तेरे पल पल मुस्कराहट की चाहत मे,
तिल तिल कर मरते रहे हम|  




रचनाकार --प्रदीप तिवारी
www.pradeeptiwari.blogspot.com

1 comment:

मनीष कुमार ‘नीलू’ said...

जिस मंजिल मे बैठकर तुम इतरा रहे हो आज ,
उस मंजिल की सीढी बनाते रहे हम|
तेरे पल पल मुस्कराहट की चाहत मे,
तिल तिल कर मरते रहे हम|

bahut khoob..sundar abhivyakti..