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Thursday, October 13, 2011

जिन्दगी


यह ज़िन्दगी की शाम
अजब सा सोच है
कभी है होश,
कभी खामोश है |
कभी थे स्वाद के चटकारे
चमकती आँखों के नज़ारे
पर सब खो गये
गुम हो गये
और खामोश फ़िजाओं में
हम खो गये |
कभी था केनवास रंगीन
जो अब बेरंग है
मधुर गीतों का स्वर
बना अब शोर है
पर विचार श्रंखला मे ना कोई रोक है
और ना गति अवरोध है |
हाथों में था जो दम
वे कमजोर हैं
चलना हुआ दूभर
बैसाखी की जरूरत और है
अपनों का है आलम यह
कि अधिकांश पलायन कर गये
बचे थे जो
पतली गली से निकल गये
हम बीते कल का
फ़साना बन कर रह गये |
आशा

5 comments:

sushma 'आहुति' said...

very nice...

सागर said...

bhaut hi sundar...

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

मनीष कुमार ‘नीलू’ said...

बहुत सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति...|
कभी मौका मिले तो मेरे ब्लाग पर भी आयें।
http://www.mknilu.blogspot.com/

***Punam*** said...

sundar khayalaat....