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Monday, September 5, 2011

teacher



शिक्षक होकर भी शिक्षक के बारे मे ,
लिखते हुए मेरी कलम अटकने लगी|
शायद वो मूल बातो से कही भटकने लगी|
शायद शिक्षक ,शिक्षक नहीं,या शिष्य ,शिष्य नहीं,
या फिर गुरु शिष्य की परंपरा कही भटकने लगी|
फिर भी कहना चाहूँगा एक बात,
गुरु हो या शिष्य हो बस दोनों मे कर्त्तव्य निष्ठां हो |
आचार ,व्यव्हार से दोनों समर्पित हो,
सच्चाई ,ईमानदारी का पाठ सर्वोपरि हो|
राष्ट्र निर्माण ,समाज निर्माण मे आपका योगदान अतुलनीय हो|
बस यही अभिलाषा है मेरी आपका भविष्य ,
चन्द्रमा की सीतलता लिए सूर्य की तरह उज्जवल हो|

रचनाकार -प्रदीप तिवारी
www.kavipradeeptiwari.blogspot.com
www.pradeeptiwari.mca@gmail.com

2 comments:

vandan gupta said...

सही कहा।

रविकर said...

पहली कक्षा की शिक्षिका--
माँ के श्रम सा श्रम वो करती |
अवगुण मेट गुणों को भरती |
टीचर का एहसान बहुत है --
उनसे यह जिंदगी संवरती ||


माँ का बच्चा हरदम अच्छा,
झूठा बच्चा फिर भी सच्चा |
ठोक-पीट कर या समझाकर-
बना दे टीचर सच्चा-बच्चा ||


लगा बाँधने अपना कच्छा
कक्षा दो में पहुंचा बच्चा |
शैतानी में पारन्गत हो
टीचर को दे जाता गच्चा ||