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Friday, September 2, 2011

कलम





कलम का पुजारी हू.
कलम मेरी बंदगी.
कलम से ही है मेरी जिन्दगी.
ख़ुशी,गम,प्रेम,वियोग, 
मे है मेरी साथी.
जिस रस को सोचा मैंने मन मे.
उसको लिखा है इसने अछरो मे.
प्रेम मे प्रेम रस है.
वीरो का वीर रस है.
रशिको का स्र्यंगार रस है.
कविका का काव्य रस है.
मेरा तो यह जीवन रस है.
इसकी इसी महिमा पर
मेरा संपूर्ण जीवन समर्पित है.


रचनाकार --प्रदीप तिवारी
www.kavipradeeptiwari.blogspot.com
www.pradeeptiwari.mca@gmail.com

6 comments:

शालिनी कौशिक said...

kalam ki mahima ka sashakt varnan.
फांसी और वैधानिक स्थिति

Dr Varsha Singh said...

प्रदीप तिवारी जी,
कमाल के भाव लिए है रचना की पंक्तियाँ .......आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

pradeep tiwari said...

dahnywad ap ko

vidhya said...

वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

pradeep tiwari said...

thanku vidhya ji

prerna argal said...

आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली(७) के मंच पर प्रस्तुत की गई है/आपका मंच पर स्वागत है ,आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये /आप हिंदी की सेवा इसी तरह करते रहें ,यही कामना है / आप हिंदी ब्लोगर्स मीट वीकलीके मंच पर सादर आमंत्रित हैं /आभार/