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Wednesday, September 28, 2011

सिसकती रुह

सिसकती रुह परेशान है।
मेरी जिंदगी अब समसान है।


रंगत बुलंद है रंजिशों की
रंजीदा दिल बेजान है।

 शिगाफ है बेआबरु जिगर में
गर्दिश में हमारी शान है।

तअल्लुकात क्या रखूं शीरीनी से,
जब जहर
में बुर्द मेरी जान है।

बेगाना हुआ दिल बेकसूर
अब बेहया का क्या मुकाम है?

सूफी बनने को चला था वो,
आज खाक मे उसका ईमान है।

क्यों उम्मीद करुं और सब्र करु
जब रहगुजर का काम तमाम है।



मनीष कुमार ‘नीलू’
समस्तीपुर बिहार
E-mail: jiya_jist@yahoo.com 


2 comments:

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति ||
माँ की कृपा बनी रहे ||

http://dcgpthravikar.blogspot.com/2011/09/blog-post_26.html

वन्दना said...

बहुत सुन्दर रचना।