*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Saturday, September 24, 2011

कब दुलहन बनायेगा ?

मुंतजिर हूं मैं तेरी] तू कितना सितम ढायेगा
ये उसूल मुहब्बत की तुम कब निभायेगा\

आया जीस्त का पैगाम परवर दीगार से
हमे हकीकत से रुबरु तू कब करायेगा\


मेरी कोई तुम बिन] वजूद नही हमदम
मेरे बिना तू भी नही जी पायेगा।

पोछ दो आंसू मेरी तुम अपनी हथेली से
कब तलक तुम तन्हा हमे रुलायेगा\

कब लायेगा बारात] शहनाईयों के साथ
कब हमे तुम अपना दुलहन बनायेगा\

वादा किया थामूंगा] उम्र भर के लिये
कब वो कसम फख्र से आकर निभायेगा\

मुरीद हूं मैं तेरी] उम्मीद के चमन में
दे कोई सदा] नही तो सांस टूट जायेगा।

2 comments: