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Tuesday, September 13, 2011

सपनों की दुनिया

सपनों की  दुनिया     

आओ हम कहीं ऐसी जगह चलें 
जहाँ दूर तक खुली फिजां हो 
हरी भरी वादियाँ हो 
नदियाँ और झरने हों 
चहचहाते पंछी और फूल हों 
दूर तक फैली हरियाली हो
आओ हम कहीं ऐसी जगह चलें
जहाँ किसी के चीखने की आवाज ना हो
किसी भूखें बच्चे का रोना ना हो 
किसी औरत की बेबसी ना हो 
किसी पर अत्याचार ना हो 
कहीं भ्रष्टाचार ना हो

आओ हम कहीं ऐसी जगह चलें 
जहाँ हर तरफ शांति सुकून हो 
आपस मैं अपनापन हो 
पुलकित प्रफुलित  चेहरे हों
और जहाँ हो सिर्फ 
प्यार-प्यार-प्यार
            



4 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

अच्छी रचना है,

वैसे पहाडों में ऐसे स्थान मिल जायेंगे, जहाँ शांति मिलेगी कोई तंग नहीं करेगा।

सागर said...

bhaut hi sundar....

prerna argal said...

सबसे पहले आप सबको हिंदी दिवस की शुभकामनायें /आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद की आप सबने हमारी रचना पर इतनी अच्छी टिप्पड़ी की और उसको पसंद किया /आशा है आगे भी आपका आशीर्वाद हमारी रचनाओं को मिलता रहेगा / मेरी नई पोस्ट हिंदी दिवस पर लिखी हुई रचना पर आपका स्वागत है /


my blog
www.prernaargal.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सपनों की दुनिया अच्छी लगी