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Sunday, September 11, 2011

**वो लोकगीत**


न जाने कहाँ
खो गई
मिट्टी की वो
असली खुशबू
गुम हुए
आधुनिकता में
मीठे-सुरीले
वो लोकगीत |


कर्ण-फाड़ू
संगीत ही रहा
वो असली रंगत
नहीं रही
मूल भारत की
याद दिलाती
कहाँ गए
वो लोकगीत |


एफ. एम., पोड ने
निगल लिया
फिल्मी गानों ने
ग्रास लिया
अब तो कोई
सुनता भी नहीं
न गाता कोई
वो लोकगीत |

3 comments:

vidhya said...

बहुत खूब

आशा said...

बहुत भावपूर्ण |
आशा

Pallavi said...

भारत की संस्क्रती और सभ्यता की गुम होती विरासत पर आपका यह प्रयास अच्छा लगा
समय मिले आपको कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर
आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/