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Thursday, September 22, 2011

श्राद्ध

श्राद्ध
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एक दिन बाद
बहू को आया याद
अरे कल था ससुरजी का श्राद्ध
आधुनिका बहू ने क्या किया
डोमिनोस को फोन किया
और एक पिज़ा पंडितजी के यहाँ भिजवादिया
ब्राहमण भोजन का ये मोडर्न स्टाइल था
दक्षिणा के नाम पर कोक मोबाइल था
रातससुरजी सपने में आये
थोड़े से मुस्कराए
बोले शुक्रिया
मरने के बाद ही सही,याद तो किया
पिज़ा अच्छा था,भले ही लेट आया
मैंने मेनका और रम्भा के साथ खाया
उन्हें भी पसंद आया
बहू बोली,अच्छा तो आप अप्सराओं के साथ खेल रहे है
और हम यहाँ कितनी मुसीबतें झेल रहे है
महगाई का दोर बड़ता ही जाता है
पिज़ा भी चार सो रुपयों में आता है
ससुरजी बोले हमें सब खबर है भले ही दूर बैठें है
लेट हो जाने पर डोमिनो वाले भी पिज़ा फ्री में देते है

6 comments:

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह!
बहुत बढ़िया!

Ghotoo said...

thanks for liking my poem

ghotoo

वन्दना said...

वाह वाह …………बहुत बढिया।

सदा said...

वाह ...बहुत खूब ।

Pallavi said...

बढ़िया व्यंगात्मक रचना... :)
समय मिल जाये कभी तो आइये गा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
http://mhare-anubhav.blogspot.com/