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Monday, September 12, 2011

सीता


                  धैर्य ,साहश ,विस्वाश ,की मूर्ती थी|
                  सच्ची,नारीधर्म की प्रतिमूर्ति थी |
पुत्री धर्म ,पत्नी धर्म,माँ धर्म क्या खूब निभाया|
   सीता के लिए हर मुख से माँ निकल आया |
                    
                      कास फिर से चरित्र निर्माण हो जाये|
                      इस भारत का बेडा पार हो जाये|
                       हर घर मे लव ,कुश हो जायेंगे,
                        रावणों का संघार हो जाये|

पर चरित्र निर्माण कही खो गया है|
हर जगह आधुनिकता का वास हो गया है|
सीता शिर्फ़ रामायण का पात्र बची है|
नारी धर्म का नाश हो रहा है|
चलो उठ नव चेतना लाये|
हर बच्ची को सीता का पाठ  पढाये |

        
रचनाकार-प्रदीप तिवारी
www.kavipradeeptiwari.blogspot.com
www.pradeeptiwari.mca@gmail.com

3 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर, सार्थक अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

वन्दना said...

sundar sandesh deti sarthak abhivyakti.

prerna argal said...

बहुत सुंदर और चरित्र निर्माण का पाठ पढ़ाती हुई सार्थक रचना /पर नारी अगर सीता जैसी बने तो पुरुष भी राम जैसे हों /सिर्फ नारी को ही नहीं पुरुषों को भी चरित्र निर्माण का पाठ पढ़ाना चाहिए /बधाई आपको एक अच्छी रचना के लिए /



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