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Tuesday, September 13, 2011

तड़पते रिश्ते

मै तन्हा कितना मजबूर हो गया,
क्यूँ हमसे इतना वो दूर हो गया।
तस्सबुर में जिसको खुदा हमने माना,
रौंद कर गुलशन वो काफुर हो गया।

तकदीर की दर्पण में तस्वीर बसाया था,
आज मेरा वो आईना चूर चूर हो गया।

कभी मुफलिसी का फिक्र मैने किया ही नहीं,
उसे क्यूँ दौलत पे गुरुर हो गया।

मुश्किल से होता है मुक्कमल कोई रिश्ता,
उसे रिश्ता तोड़ने का सुरुर हो गया।

कल तलक जिन्दा था जज्बा ऐ मोहब्बत,
आज करके उसका कत्ल,वो क्रूर हो गया।

बिखड़ गया वजूद तड़पते रिश्तों का,
किया रब से दुवा,सब नामंजूर हो गया।

उजाला था कितना रुहानी रिश्तों में,
आज क्यूँ ये रिश्ता बेनूर हो गया।

कवि परिचयः-
मनीष कुमार 'नीलू'
समस्तीपुर,बिहार


3 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

बेहतरीन शब्द।

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत बढ़िया रचना |

मेरी नई रचना देखें-
**मेरी कविता:राष्ट्रभाषा हिंदी**

Amit said...

kya khoob likha hai aapne........awsom.......keep it on.....