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Sunday, September 18, 2011

याद आई

आज फिर किसी की याद आई ,
आज फिर वो शाम आई ,
वो झुल्फो की काली घटाओ से 
आज फिर आँखों में नमी आई 

वो प्यारी सी हंसी ,
वो हया ,वो अदा 
वो सजा आज फिर याद आई 

अंजानी थी मुलाकात ,
वो पहली बात और 
वो पहली रात 
आज फिर याद आई 

शबनम की बूंदों से
पत्तो पर चमक आई 
वो पूनम में अमावस आज फिर आई 

हर कदम साथ चलने की बात 
वो आँखे चुराना ,
वो लटो का जादू 
वो हाथो में हाथ 
वो नजाकत फिर याद आई .
(चिराग )

4 comments:

दिनेश पारीक said...

पहले तो में आप से माफ़ी चाहता हु की में आप के ब्लॉग पे बहुत देरी से पंहुचा हु क्यूँ की कोई महताव्पूर्ण कार्य की वजह से आने में देरी हो गई
आप मेरे ब्लॉग पे आये जिसका मुझे हर वक़त इंतजार भी रहता है उस के लिए आपका में बहुत बहुत आभारी हु क्यूँ की आप भाई बंधुओ के वजह से मुझे भी असा लगता है की में भी कुछ लिख सकता हु
बात रही आपके पोस्ट की जिनके बारे में कहना ही मेरे बस की बात नहीं है क्यूँ की आप तो लेखन में मेरे से बहुत आगे है जिनका में शब्दों में बयां करना मेरे बस की बात नहीं है
बस आप से में असा करता हु की आप असे ही मेरे उत्साह करते रहेंगे

veerubhai said...

शबनम की बूंदों से
पत्तो पर चमक आई
वो पूनम में अमावस आज फिर आई
बेहद सशक्त रचना .

veerubhai said...

बेहद सशक्त रचना .

Maheshwari kaneri said...

शबनम की बूंदों से
पत्तो पर चमक आई
वो पूनम में अमावस आज फिर आई ... बहुत सुन्दर और बेहद सशक्त रचना ....