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Tuesday, September 13, 2011

प्रेम विवाह का अर्थ स्वेच्छा से विवाह करना है?

प्रेम विवाह से सम्बन्धित विचार व्यक्त करने से पूर्व ये स्पष्ट करना चाहती हूँ कि ये सामान्य परिस्तिथियों से सबंधित विचार हैं,अपवाद सदा होते हैं. सभी विवाह योग्य अभ्यर्थियों को मेरी हार्दिक मंगलकामनाएं.शुभस्य पन्थानः सन्तु.
Love marriage/ arranged marriage एक बहु चर्चित व विवादित विषय रहा है.भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि देखा जाय तो आम प्रचलन के अनुसार माता-पिता बच्चों के लिए सर्वगुण सम्पन्न जीवन साथी अपनी सामर्थ्य के अनुसार ढूंढते हैं,और अपने समुदाय के रीतिरिवाजों के अनुरूप विवाह कर देते हैं.अर्थात विवाह जो हमारे  समाज में एक पवित्र संस्कार है,एक बंधन है को सम्पन्न करने का उत्तरदायित्व माता-पिता का माना जाता रहा है.
पूर्व में  परम्परागत परिवारों में लड़के-लड़कियां शिक्षा प्राप्त करके भी माता-पिता की इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए उसको स्वीकार कर लेते थे और यही क्रम चला आ रहा है ,लड़के लडकी को एक दूसरे को चेहरा दिखा दिया,उचित समझा तो परिजनों ऩे शेष जानकारी दे दी.और यदि पसंद है तो हाँ हो गयी ,एक दूसरे को बधाई दी और रस्मों के बाद विवाह हो गया.लडकी भी पति या परिवार कैसा भी हो सामंजस्य स्थापित कर लेती थी ,उसके पास कोई विकल्प नहीं था,आज भी  अधिकांश परिवारों में. लगभग यही स्थिति है,बस थोडा सा अंतर अब ये आया है, कि परिवर्तित वातावरण में बच्चों की पसंद पूछ ली जाती  है.२० २५ मिनिट बात करने का अवसर यदि मिल भी गया तो एक दूसरे के विषय में क्या पता चल सकता है.ज्यादातर विषय तो बायोडेटा में वर्णित ही होते हैं
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              विवाह के दूसरे स्वरूप जिसको Love marriage का नाम दिया गया है,हमारे समाज में   आम नहीं था कुछ केसेज में पूर्व में भी ऐसा होता रहा है,जहाँ लड़के लडकी अपनी पसंद के अनुसार विवाह कर लें.परन्तु पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव,शिक्षा का प्रचार-प्रसार,प्रोफेशनल शिक्षा,जॉब तथा फिल्मों का प्रभाव और तथाकथित आधुनिकता की बयार सबके प्रभाव से प्रेम विवाह अब बढ़ने लगे हैं. पहले दोस्ती और फिर विवाह.
प्रेम +विवाह दो शब्दों से मिलकर बना प्रेम विवाह की यदि व्याख्या की जाय ,तो बड़ी जटिल है.प्रेम का  अर्थ अब व्यवहारिक अधिक है,क्योंकि प्रेम में विशुद्ध प्रेम प्रधान होता है,जबकि ऐसा प्रेम  होने पर ही विवाह हो ये आवश्यक नहीं.और प्रेम तो पति-पत्नी में विवाह के पश्चात भी होता है.कितना आश्चर्य है कि जो पत्नी अपने माता-पिता का घर ,बहिन भाई सबको छोड़ कर पति गृह में आती है,उसको वही घर अपना लगने लगता है.
                                         विवाह दो प्राणियों को अटूट बंधन में बांधता है.सौभाग्यशाली पति- पत्नी के मध्य एक ऐसा बंधन होता है,जो सभी रिश्तों में महत्वपूर्ण और प्रधान हो जाता है.सम्पूर्ण जीवनं पति पत्नी को व्यतीत करना होता है,उनका शेष भविष्य पारस्परिक सामंजस्य पर निर्भर करता है,ऐसे में उनके मध्य एक पारस्परिक समझ (understanding)  विकसित होनी आवश्यक है.इस समझ को विकसित करने के लिए आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कुछ समय मिलना जरूरी है,ये समझ विकसित करने के लिए माता-पिता द्वारा सुझाया मैच हो या फिर स्वयं की पसंद का.
 सफलता,असफलता का जहाँ तक प्रश्न है,दोनों केसेज में सफलता -असफलता रहती है.निर्भर करता है,दोनों की मानसिकता ,परिपक्वता और परिस्तिथियों पर. पूर्वकाल में छोटी आयु में विवाह सम्पन्न होते थे,कोई विशेष महत्वाकांक्षाएं नहीं होती थी,जॉब आदि की भी समस्याएं कोई विशेष नहीं थी अतः लड़कियां सामन्जस्य स्थापित कर लेती थी.,यहाँ तक कि यदि परिवार या पति मनोनुकूल नहीं भी है.परिवार के साथ ही रहना होता था. सुख या दुःख को जीवन का एक पार्ट मानकर चलना नियति बन जाता था.
परन्तु किसी भी परिस्थिति को नियति मान कर जीवन का बोझ ढोने का समय समाप्त हो रहा है,आर्थिक स्वावलंबन भी इसका एक कारण है.ऐसे में यदि एक दूसरे के विषय में भली भांति जान कर विवाह किया जाय तो शायद जीवन अधिक सुखी हो सकता है.क्योंकि दैनिक जीवन में कलह ,मार-पीट अनेकानेक समस्याओं की जनक बन जाती  है और ऐसी घटनाएँ  दोनों ही प्रकार के विवाहों में होती हैं..पारिवारिक जीवन का अस्थायित्व असह्य होता है.और आज पाश्चात्य प्रभाव से कहा जाय या पीढी अन्तराल प्रेम विवाह करने वाले युगल  भी तलाक लेने के लिए उद्यत दीखते हैं.इसका एक कारण ये भी है कि दोस्ती के समय लड़का और लडकी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करने का प्रयास करता है और जब व्यवहारिकता से सामना होता है,तो कल्पनालोक से बाहर निकलने पर वह सब बखेड़ा लगता है.
(विवाह विच्छेद या तलाक मेरे विचार से तभी स्वीकार्य है,जब स्थिति अपरिहार्य हो जाय.)
माता-पिता जो बच्चों के हितैषी होते हैं,को अपना उत्तरदायित्व पूर्ण करने के नाम पर अपनी मर्जी थोपने की भूल नहीं करनी चाहिए,.कभी कभी माता-पिता या अन्य परिजन बच्चों के उनकी इच्छा से विवाह करने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं,जिसे सम्पूर्ण परिवार में कटुता आ जाती है.क्योंकि जिन बच्चों की हितचिंता आप कर रहे हैं,उनके अपने जीवन के कुछ स्वप्न,अरमान ,आकांक्षाएं होते हैं,ऐसे में उनपर अपनी इच्छा  थोपना मेरे विचार से उपयुक्त नहीं क्योंकि उससे चार जीवन + दो  परिवार के शेष सभी सदस्यों  का जीवन बर्बाद होता है.हाँ यदि कोई बात आपको बहुत अधिक भयावह लग रही है,तो उनको समझाया जा सकता है.परन्तु आपका बल प्रयोग उनमें विद्रोह की भावना उत्पन्न करता है.
यदि बच्चों को सकारात्मक वातावरण प्रारम्भ से ही मिले तो वे भी  अनुचित कार्य करने से बचने का प्रयास करेंगें.बहुत अधिक नियंत्रण,भी विद्रोह की भावना में वृद्धि करता हैं.
 गृहस्थ जीवन में प्रवेश एक ऐसा शुभ संस्कार है,जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सभी दायित्व पूर्ण करता है,अतः हंसी खुशी से भरपूर हो.जीवन की सभी कटुताएं समाप्त हों.अतः बच्चों को उनकी खुशियाँ दीजिये  और साथ ही अनुरोध युवा पीढी से भी विवाह एक पवित्र बंधन है,इसकी शुचिता बनाये रखिये.

लेखिका परिचयः-
निशा मित्तल
मुजफ्फरनगर,(उ.प्र.)

chandravila@jagranjunction.com  

1 comment:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

जी हाँ एक बहुत ही अच्छा लेख भी है।