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Friday, September 30, 2011

खुदगर्ज़ लीडरों को किनारे करने की इच्छा शक्ति जनता में आज भी नहीं है।

हरेक आदमी अच्छी बातों को अच्छा और बुरी बातों को बुरा समझता है। हरेक आदमी को शांति और न्याय को अच्छा और दंगे-फसाद और खून खराबे को बुरा समझता है। इसके बावजूद लोग शांति भंग करते हैं और दंगा करते हैं और खून बहाते हैं।
सवाल यह नहीं है कि इसने ज्यादा बहाया या उसने ज्यादा बहाया और न ही यह सवाल है कि किसने पहले बहाया और किसने बाद में बहाया ?
असल में सवाल यह है कि जिसने भी बहाया तो क्यों बहाया ?
श्री लंका तमिलों ने सिंहलियों को मारा या सिंहलियों ने तमिल को ?
अफगानिस्तान में अमरीका ने पठानों को मारा या पठानों ने अमरीकियों को ?
और फिर यही बात हिंदुस्तान के लिए है कि हिंदुओं को किसने मारा ?
और मुसलमानों को किसने ?
आखिर इस मारामारी से लाभ होता किसे है ?
जनता को तो होता नहीं है।
इसका लाभ राजनीतिक दल ही उठाते हैं। 
मुस्लिमों की भलाई में आग उगलने वाले मुस्लिम लीडर भी इसका लाभ उठाते हैं और हिंदुओं की भलाई के लिए जबानी जमा खर्च करने वाले लीडर भी लाभ उठाते हैं।
इनके भड़काए में आकर लडने वाले या उसकी चपेट में मरने वाले आम आदमी को तो इन्होंने कभी कुछ दिया ही नहीं, अपनी जान गंवाने वाले अपने कार्यकर्ताओं के परिवारों को भी इन्होंने कभी कुछ न दिया।
दुख की बात यह है कि इन्हें किनारे करने की इच्छा शक्ति जनता में आज भी नहीं है।

आज अपने गिरेबान में झांक कर देखें- अज़ीज़ बर्नी

बुनियाद (NBT)

दंगों में नुक्सान किसका ?

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