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Friday, September 30, 2011

मेरा हृदय बड़ा है....

मैंने ये कब कहा कि
मेरा हृदय बड़ा है
तुम्हीं  तो कहते रहे
कि
पुरुष का हृदय
नारी से विशाल है

सबको समेट लेता है
एक साथ

तभी शायद
तुम्हारे
सागर से हृदय में
मैं
सिर्फ एक बूँद बन कर रह गयी

और तुमने
मुझ सीप से हृदय में
मोती सा
साम्राज्य स्थापित कर लिया

कवयित्री परिचयः-
नाम:- अनिता अग्रवाल
इलाहाबाद (उ.प्र.)
जन्म:- २० जुलाई
शिक्षा:- स्नातकोत्तर
काव्य संग्रह:- "अंतर्मन के स्पंदन"
रूचि:- देश विदेश घूमना, पेंटिंग, रेखा-चित्र, फोटोग्राफी, लिखना, वाद्य संगीत सुनना और बजाना. बारिश, गुलाब, समुंदर, पहाड़ी नदी, पहाड़, घटा, उगता व डूबता सूरज,निश्छल बच्चे की मुस्कान और भी ना जाने क्या-क्या देखना अच्छा लगता है....

5 comments:

रविकर said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ||

बधाई ||

dcgpthravikar.blogspot.com

***Punam*** said...

और तुमने
मुझ सीप से हृदय में
मोती सा
साम्राज्य स्थापित कर लिया

कुछ ऐसी ही हालत है इधर भी...!
सुन्दर रचना...!!

DR. ANWER JAMAL said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .

बधाई .

Ghotoo said...

bahut sundar bhabhivyakti -badhai

ghotoo

Dr Varsha Singh said...

अनिता अग्रवाल जी,
मनोभावों को बेहद खूबसूरती से पिरोया है आपने....... हार्दिक बधाई।