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Thursday, September 22, 2011

कशमकश




  • उस दिन तो बरसात न थी
    मौसम सुखमय तब भी न लगा
    सब कुछ था पहले ही सा
    फिर मधुर तराना क्यूं न लगा |
    शायद पहले बंधे हुए थे
    कच्चे धागों की डोर से
    लगती है वह टूटी सी
    सूखी है हरियाली मन की |
    सुबह वही और शाम वही
    है रहने का स्थान वही
    पर लगता वीराना सारा मंजर
    रहता मन बुझा बुझा सा |
    यादों की दुनिया से बाहर
    आने की कशमकश में
    होती है बहुत घुटन
    पर है अनियंत्रित मन |
    मन नहीं चाहता
    किसी और बंधन में बंधना
    अब फंसना नहीं चाहता
    दुनियादारी के चक्रव्यूह में|
आशा



















5 comments:

prerna argal said...

मन की बेचेनी को बताती बहुत ही सार्थक एवं भाव्मई रचना बहुत बधाई आपको /
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें /



www.prernaargal.blogspot.com

वन्दना said...

ये मन ऐसी ही कशमकश मे कभी कभी फ़ंस जाता है।

Ghotoo said...

aashaji
kashankash ka naam hi jindagi hai-ese hi jindagi jeene ko mil jaaye
to jeene ka maza hi kya

ghotoo

Sadhana Vaid said...

मनोभावों का बहुत ही सुन्दर चित्रण ! कई बार मन ऐसी उलझनों से बचना चाहता है जो सुख की अपेक्षा दुःख और तनाव का कारण बन जायें ! बहुत सुन्दर रचना !

prerna argal said...

आप की पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (१०) के मंच पर शामिल की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप हमेशा ही इतनी मेहनत और लगन से अच्छा अच्छा लिखते रहें /और हिंदी की सेवा करते रहें यही कामना है /आपका ब्लोगर्स मीट वीकली (१०)के मंच पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें /