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Saturday, September 24, 2011

जब मोबाईल ना होता था

जब मोबाईल ना होता था
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वो दिन भी क्या दिन होते थे,जब माबाइल ना होता था
एक काला सा चोगा अक्सर,हर घर की शोभा  होता था
टिन टिन टिन घंटी के स्वर से,घर भर में आती थी रौनक
खुद का एक  फोन   होने से    ,ऊंचा होता था   स्टेटस
दस छेदों वाले डायल को,घुमा घुमा नाख़ून घिसते थे
जोर जोर से हल्लो हल्लो,चिल्ला कर भी ना थकते थे
फोन हमारा,मगर पडोसी,लाभ उठाते उसका जी भर
 अपने परिचितों को देते,फोन हमारे वाला नंबर
उनका फोन आता तो घर के ,बच्चे जाते,उन्हें बुलाते
वो आते,बातें भी करते,चायपान भी करके  जाते
हसीं पड़ोसन,मुस्काती सी,कभी फोन करने आती थी
और लिपस्टिक ,लगे होठ के,सुन्दर निशां,छोड़ जाती थी
डाकघरों में,दूरभाष को,लम्बी सी लाइन लगती थी
ओर्डीनरी,अर्जेंट,लाईटनिंग,कालों की घंटी बजती थी
तीन मिनिट का काल रेट था,बातें ना लम्बी खिंचती थी
फोन डेड होता तो घर में,ख़ामोशी सी आ बसती  थी
लाइनमेन नाम प्राणी को, देना कुछ चंदा होता था
तो जो फोन डेड होता था, जल्दी से ज़िंदा होता  था
रात ,काल के ,रेट आधे थे,इसीलिए वो कम सोता था
वो दिन भी क्या दिन होते थे, जब मोबाईल ना  होता था

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

मगर इससे पहले तो चोगा उठाकर ट्रंक कॉल भी बुक कराते थे!

संजय भास्कर said...

वाह बेहतरीन !!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।