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Friday, September 16, 2011

दौड़ जिन्दगी की

जिंदगी की दौड़ में दौड़ता चला गया,
पीछे न रह जाऊं किसी से,
यही सोचकर भागता चला गया,
सही-गलत सोचने का वक्त ही न था,
बस हरहाल में बढता चला गया,
दिल टूटे, सपने टूटे, छूट गया सब का साथ,
बस सभी को सीढ़ी समझकर चढ़ता चला गया,
जीतने की चाहत में,
फरेब सीखा, धोखा सीखा, सीखे हर जंजाल,
बस हर जाल को सुलझाता चला गया,
मंजिल मिली तब जाकर ठहरा,
बस वहाँ पर ख़ामोशी से ठहरा ही रह गया,
न रिश्ते थे, न नाते थे, न था प्यार भरा संसार,
अपनों का सन्नाटा था , तन्हाई थी ,
छूट गया था मेरा सब  घरबार.

रचनाकार -प्रदीप तिवारी




3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर रचना!
इसी का नाम दुनिया है!

Sunil Kumar said...

ज़िंदगी इसी में तमाम होती है !!!

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।