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Tuesday, September 20, 2011

नाजायज भी जायज है




तू अगर खड़ी हो सम्मुख तो,
दिल की दुर्घटना जायज है,
आँखों की बात करूँ कैसे?
इनका ना हटना जायज है॥

स्वप्नों में उड़ना जायज है,
चाँद पकड़ना जायज है,
गर तुम हो साथ मेरे तो,
दुनिया से लड़ना जायज है॥

किसी और से आँख लड़े कैसे?
ये सब तो अब नाजायज है
तू हो मेरे आलिंगन में तो,
धरती का फटना जायज है॥

चाहें लाख बरसतें हो बादल,
उनका चिल्लाना जायज है,
गर तेरा सर हो मेरे सीने पर,
बिजली का गिरना जायज है॥

अचूक हलाहल हो सम्मुख,
मेरा पी जाना जायज है,
इक आह हो तेरे होंठों पर,
तो मेरा डर जाना जायज है॥

स्रष्टि का क्रंदन जायज है,
हिमाद्रि बिखंडन जायज है,
मेरे होंठो पर हों होंठ तेरे,
तो धरा का कम्पन जायज है॥

तू हो तीर खड़ी नदिया के,
उसका रुक जाना जायज है,
बस तेरे लिए हे प्राणप्रिये,

5 comments:

रविकर said...

सुन्दर भाव --
बधाई ||

अभी भी डर
से नहीं सकी,
उबर |
भेजना खबर
क्या वो भी होगा जायज --
जो आएगा --
हमारे घर |
साल भीतर |

Rajesh Kumari said...

premras se sarabor neeraj ji ki kavita bahut achchi lagi.us par ravikar ji ki tippani majedaar lagi.

Neeraj Dwivedi said...

Bahut bahut abhar aap dono ka.

Ravikar ji aapne bahuta majedaar comment kiya hai, shukriya.

Sunil Kumar Mishra said...

Wah Bhai Dwivedi Ji
Tujhe Pane Ki Khatir Ab Najayaj Bhi Ab Jayaj Hai

Sunil Kumar Mishra said...

Wah Bhai Dwivedi Ji
Tujhe Pane Ki Khatir Ab Najayaj Bhi Ab Jayaj Hai