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Monday, September 12, 2011

है कितनी आवश्यकता


  1. है कितनी आवश्यकता

    है कितनी आवश्यकता चिंतन की  मनन की
    आत्म मंथन की कभी इस पर विचार किया 
    क्या सब तुम जैसे हैं इस पर ध्यान देना
    जब विचार करोगे अनजाने न बने रहोगे
    सागर से निकले हलाहल का पान कर पाओगे
    तभी शिव होगे संसार चला पाओगे |
    यदि थोड़ी भी कमी रही जीवन अकारथ हो जायेगा
    जिस यश के हकदार हो वह तिरोहित हो जायेगा |
    मन वितृष्णा से भर जायेगा
    जब जानते हो कोई नहीं होता अपना ,
    सारे रिश्ते होते सतही सतर्क यदि हो जाओगे
    तभी उन्हें निभा पाओगे
    मन में उठे ज्वार को सागर सा समेट
    अपने पर नियंत्रण रख ,करोगे व्यवहार जब
    तभी सफल जीवन का मुँह देख पाओगे|
    रत्न तो पाये जा सकते हैं पर गरल पान  नहीं सरल
    जो दिखता है सब सत्य नहीं है
    जितना गहराई से सोचोगे गहन चिंतन करोगे ,
    तभी हो पायेगा समस्याओं का समाधान |
    सफल जीवन की होगी पह्चान
    जो आदर सम्मान मिलेगा
    जिसके हो सही हकदार
    उस पर यूँ पानी न फिरेगा |

    आशा 

1 comment:

रविकर said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
आपको बहुत बहुत बधाई ||