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Sunday, September 11, 2011

विकास की आंधी

हमारा छोटा सा घर था,
और उस पर एक छोटी सी छत थी
जहाँ हम सर्दी में ,कुनकुनी धूप का आनंद उठाते थे
 तेल की मालिश कर ,
नंगे बदन को,
सूरज की गर्मी में तपाते थे
और गर्मी की चांदनी रातों में,
सफ़ेद चादरों पर
जब शीतल बयार चलती थी,
तो तन में सिहरन सी होती थी
हमारी हर रात मधुचंद्रिका सी होती थी
पर विकास की आंधी में,
हमारे घरों के आसपास ,
उग आई है,बहुमंजिली इमारते
और बदलने पड़  गयी है,हमें अपनी आदतें
बड़ी मुश्किलें वेसी खो गयी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

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3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर अभिव्यक्ति!

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति| धन्यवाद|

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

Bahut sundar..