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Friday, September 2, 2011

जज़्बात-ए-ईश्क

कुछ सुन लो या कुछ सुना दो मुझको,
गुमसुम रहकर न यूँ सजा दो मुझको,
जान से भी प्यारी है तेरी ये मुस्कुराहट,
मुस्कुरा कर थोड़ा सा हँसा दो मुझको |


आँखों से ही कुछ सीखा दो मुझको,
थोड़ी सी खुशी ही दिखा दो मुझको,
तेरी खुशी से बढ़कर कुछ भी नहीं है,
अपनो की सूची में लिखा दो मुझको |


पलकें उठा के एक नज़र जरा दो मुझको,
ज़न्नत के दरश अब करा दो मुझको,
तेरी जीत में ही छुपी है मेरे जीतने की खुशी,
नैनों की लड़ाई में थोड़ा हरा दो मुझको |

5 comments:

Dr Varsha Singh said...

ईं.प्रदीप कुमार साहनी जी,
बेहतरीन रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई स्वीकार करें ।

pradeep tiwari said...

prem ko samarpit
hai.bhut umda

शालिनी कौशिक said...

.आँखों से ही कुछ सीखा दो मुझको,
थोड़ी सी खुशी ही दिखा दो मुझको,
तेरी खुशी से बढ़कर कुछ भी नहीं है,
अपनो की सूची में लिखा दो मुझको |
प्रदीप जी बहुत सुन्दर भावपूर्ण शब्दों में अभिव्यक्त किया है आपने अपने मन की भावनाओं को .वाह
फांसी और वैधानिक स्थिति

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भाव संयोजन्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

भावपूर्ण रचना