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Sunday, September 4, 2011

"नमोस्तुभ्यम हे सर्वोपरि".......(शिक्षक दिवस पर विशेष)

दर्पण से दर्शन तक विस्तार है तेरे प्रेम का|
धरा के आगाज़ से अंजाम तक विस्तार है तेरे प्रेम का|
तू छू ले माटी सोना हो जाए,
तेरे तपिश में स्वर्ण कुंदन बन जाये|
तू साथ दे तो अस्तित्व मिले,
तेरे सानिध्य में ही महत्त्व मिले|
तू साथ दे तो जग जीतूँ|
जो छोड़े साथ तो मैं भटकूँ|
तेरे डांट में माँ की चिंता दिखें ,
लाड में माँ की ममता मिले|
पथ-भ्रष्ट या दिग्भ्रमित होऊं,
तेरा संबल मुझे पथ ज्ञान दे|
तेरा मार्ग-दर्शन ही मुझे 
जग में सम्मान दे|
थकू जो बिच राह में तो,
तेरे शब्द पुनः स्फूर्ति दे,
इतराऊं जो मंजिल से पूर्व,
वही शब्द पुनः जागृति दे|
नतमस्तक हूँ जो तुने
धेले को मूर्त रूप दिया|
अस्तित्व-विहीना को नव रंग 
और स्वरुप दिया|
स्वाति बूंद बरस कर बह जाती
खोकर खुद को मैं मर जाती
सीप बनकर बटोर उस बूंद को,
और मोती का मुझको रूप दिया|
अपनी आभा से चमकूँ हर पल  
तम में भी ऐसा धुप मिले|
कर्जदार मैं हूँ तेरी,हर साथ का हर मोड़ पर|
जीवन-पर्यंत रहना यूँ ही,प्रार्थना कर जोड़ कर|
सृष्टि के आदि से अंत तक
तेरी कीर्ति यूँ ही अमर रहे| 
जग को मार्ग -दर्शित करने वाली,
तेरी कृति यूँ ही प्रखर रहे|
हे गौरवमयी गुरुवी नमोस्तुभ्यम|
नमोस्तुभ्यम हे सर्वोपरि|

कवयित्री परिचयः-
स्वाति वल्लभा राज 
नोयडा/बिहार


8 comments:

Shalini kaushik said...

स्वाति बूंद बरस कर बह जाती
खोकर खुद को मैं मर जाती
सीप बनकर बटोर उस बूंद को,
और मोती का मुझको रूप दिया|
बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

सम्पूर्ण रचना ही दिल से निकली है.बेहतरीन.

वाणी गीत said...

उत्कृष्ट काव्य ...
सभी गुरुओं को प्रणाम !

Sadhana Vaid said...

बहुत सुन्दर रचना ! शिक्षक दिवस पर आप सभीको हार्दिक शुभकामनायें !

pradeep tiwari said...

atulneey sabdo ka sambodhan hai.bhut hi utkrisdha hai

vandan gupta said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
शिक्षक दिवस की शुभकामनायें.

Maheshwari kaneri said...

स्वाति बूंद बरस कर बह जाती
खोकर खुद को मैं मर जाती
सीप बनकर बटोर उस बूंद को,
और मोती का मुझको रूप दिया|...बहुत सुन्दर रचना

गुरुर् ब्रह्मा गुरु विश्णु: गुरुर् देवो महेश्वर: I
गुरुर् सक्षात् परब्रह्म: तस्मै श्री गुरवे नम: II
शिक्षक दिवस पर आप सभीको हार्दिक शुभकामनायें !

रविकर said...

पहली कक्षा की शिक्षिका--
माँ के श्रम सा श्रम वो करती |
अवगुण मेट गुणों को भरती |
टीचर का एहसान बहुत है --
उनसे यह जिंदगी संवरती ||


माँ का बच्चा हरदम अच्छा,
झूठा बच्चा फिर भी सच्चा |
ठोक-पीट कर या समझाकर-
बना दे टीचर सच्चा-बच्चा ||


लगा बाँधने अपना कच्छा
कक्षा दो में पहुंचा बच्चा |
शैतानी में पारन्गत हो
टीचर को दे जाता गच्चा ||