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Friday, August 26, 2011

जिंदगी की अहमियत....


शाम ढ़ले जब मेरे घर दीपक जले
 मेरा मन घर जाने से बहुत डरे.
घर में बीमार माँ दवाईयों के इंतजार में होगी
बच्चे किताबो के इंतजार मे देख रहे होंगे द्वार।
                                                
बीबी सोच रही होगी आज आ जाए कुछ
तो पड़ोसी से जाकर न माँगू उधार
इन सभी बातों को सोचकर मन घबरा रहा था
 मेरा ब्लडप्रेशर बढ़ता ही जा रहा था
  सोचा आज कहा से लाऊ उधार
   इससे अच्छा है क्यों न मर जाऊ।
                               
इन्ही ख्यालों में खोये हुए देर हो चुकी थी
घर पर माँ और पत्नी के मन में आशंका घेर चुकी थी
   माँ का व्याकुल मन घबरा रहा था
पत्नी का झूठा साहस उन्हें ढ़ाढ़श बँधा रहा था।

 घर पहुचते ही माँ ने गले से लगाया
 पत्नी ने मुझे आसूओं से भिगोया
 तब मुझे लगा क्या करने जा रहा था
 अपनी खुशियों को ख़ुद ही मिटाने वाला था
 ये जरूरते है आज नहीं तो कल होंगी पूरी
 इनके बिना मेरी मेरे बिना इनकी जिन्दगी है अधूरी||||

कवि परिचयः-प्रदीप तिवारी
लेक्चरर,इंजीनियरींग कालेज
सतना,(म.प्र.)


5 comments:

chandrakant said...

wahh.... mamaji apne sahityapremiyo ko jhakjhor diya

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

baht badhiya rachna...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सही सन्देश देती अच्छी प्रस्तुति ... खुद को मारने से समस्याएं खत्म नहीं होतीं

pradeep tiwari said...

Dhanyawad Ap sabhi ne ki meri kavita ko apne pasand kiya.pradeep tiwari 9584533161

pradeep tiwari said...

ap sabhi mughe www.kavipradeeptiwari.blogspot.com par bhi padha sakte hai