*साहित्य प्रेमियों का एक संयुक्त संघ...साहित्य पुष्पों की खुशबू फैलाता हुआ*...."आप अपनी रचना मेल करे अपनी एक तस्वीर और संक्षिप्त परिचय के साथ या इस संघ से जुड़ कर खुद रचना प्रकाशित करने के लिए हमे मेल से सूचित करे" at contact@sahityapremisangh.com पर.....हम आपको सदस्यता लिंक भेज देंगे.....*शुद्ध साहित्य का सदा स्वागत है*.....

Followers

Tuesday, August 9, 2011

बहना मेरी

तब  था मैं बस छोटा सा, जब तू थी जीवन में आई,

पुलकित था मन हर्षित था, जब तू थी आँगन में आई |



बाल मन भी गदगद था, खुशियाँ खुद अंगना थी आई,

संग पलने संग बढ़ने को, जीवन में बहना थी आई |



हाथ मेरे बांधेगी राखी, सोच के मन उद्वेलित था,

खेलूँगा इस गुडिया से, जान के मन प्रफुल्लित था |



जैसे जैसे जीवन बीता, तू बस खुशियाँ देती गयी,

जीवन के हर एक मोड़ पर, तू बस खुशियाँ देती गयी |



आज तेरा निज जीवन है, पर मेरे लिए तू वैसी है,

गृहस्थ में तू है व्यस्त बड़ी, पर बहना मेरी तू वैसी है |



हाथ मेरा इंतजार है करता, राखी के त्यौहार का,

राखी से तेरे हाथ सजेगा, अमूल्य उस उपहार का |



दुआ है मेरी इश्वर से, सुख पाये बहना मेरी,

जो गम आये मुझे मिले, खुश रहे बहना मेरी |


www.pradip13m.blogspot.com

2 comments:

Vivek Jain said...

पवित्र प्रेम से भरी सुंदर रचना,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

धन्यवाद विवेक जी |