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Friday, August 12, 2011

झूठी आशा




चुभन नागफणी की
दरकते रिश्ते
मन में नफरत ने घर किया
व्यंग बाणों ने मन को
छलनी कर दिया |
कटुता ने पैर पसारे
विचार शून्य मन हुआ
रूखे रिश्ते सतही व्यवहार
पीठ मुड़ते ही
कटु शब्दों के बाण
कर देते जीना हराम|
क्या सभी होते सराबोर बुराई में
उनमें कुछ भी अच्छा नहीं होता
कभी उन पर भी ध्यान दिया जाता |
मखमल में लपेट किये गये वार
कितनी गहराई तक चुभते हैं
इसका भी भान नहीं रहता
बेबात छिड़ जाती बहस
इस हद तक पहुँच जाती
क्या सही क्या होता गलत
सुध इसकी भी नहीं रहती |
लगती है परम्परा बुराई खोजने की|
निंदा रस का आनन्द पा
ख़ुद ही प्रसन्न हो कर
संतुष्ट हुआ जा सकता है
पर केवल अहम की तुष्टि के लिये
किया गया अपमान सहना
सबकी मानसिकता नहीं होती
चुभन काँटों की सहन नहीं होती |
अब तो लगने लगा है
जो जैसा है वैसा ही रहेगा
उसमें परिवर्तन की आशा
है छलावा मृगतृष्णा सा
जिसके पीछे भागना
है केवल समय की बर्बादी |

आशा

5 comments:

vandana said...

पर केवल अहम की तुष्टि के लिये
किया गया अपमान सहना
सबकी मानसिकता नहीं होती
चुभन काँटों की सहन नहीं होती |
अब तो लगने लगा है
जो जैसा है वैसा ही रहेगा
उसमें परिवर्तन की आशा
है छलावा मृगतृष्णा सा
जिसके पीछे भागना
है केवल समय की बर्बादी |

सच है ...मन के भावों को पूरी तरह उतारा है आपने

Neeraj Dwivedi said...

निंदा रस का आनन्द पा
ख़ुद ही प्रसन्न हो कर
संतुष्ट हुआ जा सकता है
पर केवल अहम की तुष्टि के लिये
किया गया अपमान सहना
सबकी मानसिकता नहीं होती
चुभन काँटों की सहन नहीं होती |

Kya baat hai .. kitna Sargarbhit barnan man ke bhavon ka

Dinesh pareek said...

अति सुन्दर मन मोहित होगया आप के ब्लॉग पे आने से इस केलिए आप को बहुत बहुत धन्यवाद्
आप मेरे ब्लॉग पे भी अपना कीमती समय निकाल के आवे

vidhya said...

अति सुन्दर मन मोहित

Dr Varsha Singh said...

अब तो लगने लगा है
जो जैसा है वैसा ही रहेगा
उसमें परिवर्तन की आशा
है छलावा मृगतृष्णा सा
जिसके पीछे भागना
है केवल समय की बर्बादी |


अंतस को झकझोरती हुई बेहतरीन रचना...