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Thursday, August 18, 2011

ख़ामोशी.............

















ख़ामोशी.............
लम्बी ख़ामोशी................ 
चलो अब इसका मज़ा भी चख लें.............. 
तुझसे होते हुए कई शब्दों को सुना मैंने ,
कुछ शहद की तरह मीठे थे
और
कुछ नीम की तरह कडवे............
कुछ में तेरे प्यार की खुशबू महकती थी
तो कुछ यूँ लगता था
जैसे कोई अजनबी ने राह चलते हुए पुकारा हो ..........
कुछ को समझ पाया
और कुछ उड़ते गए यूँ ही हवा में.........
शायद यही गलती हुई मुझसे...........
शायद उनको भी समझना जरुरी था........... 
पर...............
अब जो हालात बन चुके हैं
दरम्यान अपने
शायद उन्ही शब्दों का नतीजा हैं..............
अब केवल ख़ामोशी सुनती है दोनों तरफ......... 
अब शब्द गुफ्तगू करते नहीं आपस में.............





                                                              :-मानव  मेहता




मेरे ब्लॉग              सारांश एक - अंत


                           मेरी शायरी 





5 comments:

राकेश कौशिक said...

अब केवल ख़ामोशी सुनती है दोनों तरफ.........
अब शब्द गुफ्तगू करते नहीं आपस में.........."

vidhya said...

bahut - bahut badiya

Neeraj Dwivedi said...

Yahi halat hamari bhi hai ki शब्द गुफ्तगू करते नहीं आपस में.

Bahut sundar.

Dr Varsha Singh said...

कुछ नीम की तरह कडवे............
कुछ में तेरे प्यार की खुशबू महकती थी
तो कुछ यूँ लगता था
जैसे कोई अजनबी ने राह चलते हुए पुकारा हो


मन को उद्वेलित करने वाली कविता....

***Punam*** said...

अब केवल ख़ामोशी सुनती है दोनों तरफ.........
अब शब्द गुफ्तगू करते नहीं आपस में.............


हर रिश्ते में ऐसा मुकाम आता है..
जब शब्दों कि अहमियत ख़त्म हो जाती है...

khoobsoort ....