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Tuesday, August 30, 2011

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की दो कवितायें....

मामूली सा आदमी....
मामूली सा आदमी
भी आदमी होता है
बिना प्रेस किये कपड़े
टायर की चप्पल पहने
टूटे से चश्मे में
भी देख लेता है
सत्यानवेशी सा
कुछ मामूली सी चीजे
जो बेकार सी बंगलों से
फेक दी जाती सड़को पर
उन्हें भी सहेज लेता है
कभी काकस को
एकटक निहार लेता 
मामूली सा आदमी
भी आदमी होता है
दाया पेर आगे किये गाय को
छू लेता है
विश्वास के लिये
या यूं ही अभिनय कर लेता है
कभी-कभी सड़क पर गढे
मील के पत्थर को छू लेता है
आत्मबोध के लियो
या गन्तव्य जान लेता है
मामूली सा आदमी
भी आदमी होता है
खेतों पर फकती फसल
चिड़ियो का कलरब
रहट का घूमता पहिया
उससे निकला पानी
भी कभी-कभी पी लेता है
एंकान्त में खड़े गूलर
के पास जाकर भी 
बाते कर लेता है
मामूली सा आदमी
भी आदमी होता है  

आखिर ऐसा क्या कर दिया....
आखिर ऐसा क्या कर दिया
उन्होंने हमसे हमारी स्वाधीनताछीन कर
योजनावह ढग से
हमें कुसंस्कारित कर दिया
फिलहाल हम
पीठ बहुत मुस्तैदी से थपथपा रहे
यह कर्म और धर्म है
झूठ पर झूठ गढ़ते चले जा रहे
असली चिन्ता
उत्थान में बुनियादी आधार
संभवामि युगे-युगे की गहरी अनुगूँज
अर्धम के हाथों
अपमानित किया जाता है धर्म......।
गौतम, महावीर, शंकराचार्य, तुलसी, कबीर
बगैर किसी हथियार के 
आदिम पाश्विकताओं के बीच फैलाया
इस पुकार को न समझना
सुनकर अनसुनी करना
सभ्यता के नाम पर असभ्यता को सहना
अन्याय और अत्याचार पर आँखे मूदे रहना
यह न वैदिक ऋषियों को रहा मंजूर
न हम स्वीकार सकते  हुजूर
पश्चिमी सभ्यता का शैतान
धृतराष्ट्र की सभा में भले ही बने महान
इसका उत्तर देने का हक है
एक चेतावनी देना चाहता हूँ
स्वराज स्वर्ग से
हिन्दुस्तान की धरती पर उतरेगा
गाँधी ने कहा था
आरोहण को एक हकीकत बनने
समय सिला के पास खड़ा है
जो रास्ते में पड़ा था
आज वही सिर पर चढ़ा है। 

कवि परिचयः-
सुरेन्द्र अग्निहोत्री 
राजसदन- 120/132
बेलदारी लेन, लालबाग,
लखनऊ मोः 9415508695