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Tuesday, August 16, 2011

विडंबना


मैं रवि रहता व्यस्त पर हित में ,
कुछ तो नत मस्तक होते
करते प्रणाम मुझको
पर फिर भी लगती कहीं कमी
यही विचार आता मन में
वह प्यार मुझे नहीं मिलता
जो वह पा जाता है
है अस्तित्व उसका जब कि
मेरे ही प्रकाश से |
होता सुशोभित वह
चंद्रमौलि के मस्तक पर
सिर रहता गर्व से
उन्नत उसका |
जब भी चर्चा में आता
सौंदर्य किसी का,
उससे ही
तुलना की जाती |
त्यौहारों पर तो अक्सर
रहता है वह केंद्र बिंदु
कई व्रत खोले जाते हैं
उसके ही दर्शन कर |
इने गिने ही होते हैं
जो करते प्रणाम मुझको
वह भी किसी कारण वश
यूँ कोई नहीं फटकता
आस पास मेरे
जाड़ों के मौसम में
उष्मा से मेरी
वे राहत तो पाते हैं
पर वह महत्व नहीं देते
जो देते हैं उसे |
वह अपनी कलाओं से
करता मंत्र मुग्ध सबको
कृष्ण गोपिकाओं की तरह
तारिकाएं रहती निकट उसके
लगता रास रचा रही हैं
और उसे रिझा रही हैं |
इतने बड़े संसार में
मैं हूँ कितना अकेला
फिर लगने लगता है
महत्त्व मिले या ना मिले
क्या होता है
मेरा जन्म ही हुआ है
पर हित के लिए |
आशा

7 comments:

Dr (Miss) Sharad Singh said...

सहज अभिव्यक्ति प्रवाहमय सुन्दर रचना....

Neeraj Dwivedi said...

Bahut Sundar

vidhya said...

आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें
वाह ...बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

आशा said...

डॉ शरद जी आपने कविता पसंद की बहुत अच्छा लगा
आभार |
आशा

आशा said...

विद्या जी ,
आपका मेरे ब्लॉग पर पहलीबार आने के लिए धन्यवाद |
ऐसा ही स्नेह बनाए रखें |
आशा

prerna argal said...

मैं हूँ कितना अकेला
फिर लगने लगता है
महत्त्व मिले या ना मिले
क्या होता है
मेरा जन्म ही हुआ है
पर हित के लिए/bahut hi badiyaa gahan abhibyakti aashaji.bahut sunder dhang se likhi gai shaandaar rachana.badhaai aapko.

Dr Varsha Singh said...

सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति....