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Wednesday, August 24, 2011

दूर एक ख्वाहिश रह गयी दिल मेँ....

दूर एक ख्वाहिश रह गयी दिल मेँ, 
एक जान अनजान रह गयी तो क्या।
हजारोँ यादेँ साथ लेकर भी हम, 
किसी को अपना न बना सके तो क्या।

लोगोँ की कारस्तानी दूर से नजर आयी, 
हाल अपना सुधार न सके तो क्या।

वो खामोश ही रह गये जुबाँ से, 
उन्हेँ फितरत पसन्द न आयी तो क्या।

चाहत की रोशनी मेँ मेरा धुंधला समाँ, 
तकलीफ उन्हेँ समझ न आयी तो क्या।

कोशिश रही हरदम पास जाने की, 
खुदा की रहमत न हुई तो क्या।

मासूम मिजाज है उनकी भोली अदाओँ का, 
दीदार-ए-तन्हा न कर सके तो क्या।

एक ही आरजू रहती है दिल में, 
जीने मेँ उनका साथ मिल जाये तो क्या।
कवि परिचयः-गोविन्द मालव
व्यवसायः‍-विद्यार्थी
पताः-कवाई सालपुरा,बाराँ,(राजस्थान)