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Tuesday, August 23, 2011

विश्वास किस पर करें




है दिखावे से भरपूर दुनिया
कुछ स्पष्ट नजर नहीं आता
अति वादी अक्सर मिलते हैं
कोइ तथ्य नजर नहीं आता
आँखें तक धोखा खा जाती हैं
अंजाम नजर नहीं आता |
जो दिखाई देता है
कभी सत्य तो कभी
असत्य होता है
जो कुछ सुनते हैं
उस पर विश्वास करें कैसे
आखों देखी कानों सुनी
बातों पर भी
विश्वास नहीं होता |
समाचार पत्रों के आलेख भी
अक्सर होते एक पक्षीय
अति रंजित होते हैं
जानकारी निष्पक्ष
कम ही देते हैं
आक्षेप एक दूसरे पर
और छींटाकशी
इसके सिवाय और कुछ नहीं |
हैं जाने कैसे वे लोग
कितनी ही कसमें खाईं
वादे किये कसमें दिलाईं
पर उन पर भी
खरे नहीं उतारे
विश्वास किस पर कैसे करें
यह तक स्पष्ट नहीं है |
आँखें धुंधला गईं हैं
शब्द मौन हैं
वह भी भ्रम नजर आता है
है यह कैसा चलन
आम जनता की
कोइ आवाज नहीं है
हर ओर दिखावा होता है
सत्य कुछ और होता है

3 comments:

Sadhana Vaid said...

सतही दुनिया की मिथ्या प्रवृत्तियों पर सटीक वार किया है ! बहुत सुन्दर रचना ! बधाई स्वीकार करें !

Neeraj Dwivedi said...

विश्वास किस पर कैसे करें
यह तक स्पष्ट नहीं है |
आँखें धुंधला गईं हैं
शब्द मौन हैं

Bilkul Sach kaha aapne


My Blog: Life is Just A Life
.

Priyankaabhilaashi said...

अच्छा लगा मंथन..!!! किस पर और कैसे विश्वास करें..!!!