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Tuesday, August 30, 2011

कोइ नहीं बचा इससे


जाति प्रथा का जन्म हुआ था
कार्य विभाजन के आधार पर
संकुचित विचार धारा ने
घेरा इसे कालान्तर में |
है शहरों में कम प्रभाव इसका
पर गाँवों में विकृत रूप इसका
जो भी वहाँ दिखता है
मन उद्वेलित कर देता है |
ऊँच नीच और छुआ छूत
हैं अनन्य हिस्से इसके
दुष्परिणाम सामने दिखते
कोई नहीं बचा इससे |
आपस में बैर रखते हैं
मनमुटाव होता रहता है
असहनशील हैं इतने कि
रक्तपात से नहीं हिचकते |
बलवती बदले की भावना
जब भी होती है
आक्रामक हो जाते हैं
सहानुभूति जाति की पा कर
और उग्र हो जाते हैं |
है स्वभाव मानव का ऐसा
बदला पूरा ना हो जब तक
चैन उसे नहीं आता
अधिक हिंसक होता जाता |
लूटपाट और डकैती नियति बनती
जाने कितनों की
इनसे मुक्ति यदि ना मिलती
कुछ को चम्बल का बीहड़ बुलाता |
रोज कई असहिष्णु जन्म लेते हैं
आपस में उलझते रहते हैं
जाति प्रथा के तीखे तेवर देते हैं हवा
उपजते वैमनस्य को |
यह मानव स्वभाव की उपज
और जातिवाद कि तंग गलियाँ
कितना अहित करती हैं
है क्या उचित इन सब का होना |
शांत भाव से जीने के लिए
मनुज स्वभाव बदलने के लिए
है आवश्यक इनसे बचना
और आत्मनियंत्रित होना |

आशा

1 comment:

prerna argal said...

बहुत सच्ची बात कही आपने हमारे देश मैं जात धर्म के नाम पर जितनी हिंसा होती है जितना लोगों को डराया धमकाया जाता है/ऐसा कहीं भी नहीं होता /बहुत ही सार्थाक् प्रस्तुति /बधाई आपको /




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