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Friday, August 26, 2011

होगा क्या भविष्य



छोटी बड़ी रंग बिरंगी ,

भाँति-भाँति की कई पतंग ,

आसमान में उड़ती दिखतीं ,

करती उत्पन्न दृश्य मनोरम ,

होती हैं सभी सहोदरा ,

पर डोर होती अलग-अलग ,

उड़ कर जाने कहाँ जायेंगी ,

होगा क्या भविष्य उनका ,

पर वे हैं अपार प्रसन्न अपने

रंगीन अल्प कालिक जीवन से ,

बाँटती खुशियाँ नाच-नाच कर ,

खुले आसमान में ,

हवा के संग रेस लगा कर |

अधिक बंधन स्वीकार नहीं उन्हें ,

जैसे ही डोर टूट जाती है ,

वे स्वतंत्र हो उड़ जाती हैं,

जाने कहाँ अंत हीन आकाश में ,

दिशा दशा होती अनिश्चित उनकी ,

ठीक उसी प्रकार

जैसे आत्मा शरीर के अन्दर |

उन्मुक्त हो जाने कहाँ जायेगी,

कहाँ रहेगी, कहाँ विश्राम करेगी ,

या यूँ ही घूमती रहेगी ,

नीले-नीले अम्बर में ,

कोई ना जान पाया अब तक

बस सोचा ही जा सकता है

समानता है कितनी ,

आत्मा और पतंग में |


आशा

1 comment:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी प्रस्तुति ..आत्मा के लिए सटीक बिम्ब कहा है